नादान न समझ जिंदगी, खुदखुशी करने वाले हम नहीं
हमने जीना उन परिंदो से सीखा है, जिन्हे कैद में रहना पसंद नहीं,
माना पागल है थोड़े, इरादे भी थोड़े कमजोर है
पर बिना किये कुछ कैसे चले जाये, जब जीने की इतनी होड़ है,
आज थोड़ा सा उदास, तो बहुत सारा परेशान हूँ
समस्याए तो मुझे भी है, कौन कहता है अभी " मै नादान हूँ",
काश हम भी खुले गगन के परिंदे होते
उड़ते आसमान में, कहीं और ख़ुशी से जी रहे होते,
धन-दौलत और किसी चीज़ से कोई मतलब न होता
दिन में खाने की तलाश पर रात में चैन से सोता,
न होती उम्मीद किसी से, न मज़बूरियाँ कोई होती
ख़ुशी से जीते हर पल, ये पलके गीली न होती,
होते गर परिंदे हम इस अम्बर के, कुछ तो अच्छा होता
संघर्ष का तो पता नहीं, पर जीने का खुद से तज़ुर्बा होता,
परिंदो के जीवन से जुडी, बस इतनी ही है कहानी
कितनी प्यारी होती है, इनकी छोटी सी ज़िंदगानी...
कवि- सुधीर पांडेय
हमने जीना उन परिंदो से सीखा है, जिन्हे कैद में रहना पसंद नहीं,
माना पागल है थोड़े, इरादे भी थोड़े कमजोर है
पर बिना किये कुछ कैसे चले जाये, जब जीने की इतनी होड़ है,
आज थोड़ा सा उदास, तो बहुत सारा परेशान हूँ
समस्याए तो मुझे भी है, कौन कहता है अभी " मै नादान हूँ",
काश हम भी खुले गगन के परिंदे होते
उड़ते आसमान में, कहीं और ख़ुशी से जी रहे होते,
धन-दौलत और किसी चीज़ से कोई मतलब न होता
दिन में खाने की तलाश पर रात में चैन से सोता,
न होती उम्मीद किसी से, न मज़बूरियाँ कोई होती
ख़ुशी से जीते हर पल, ये पलके गीली न होती,
होते गर परिंदे हम इस अम्बर के, कुछ तो अच्छा होता
संघर्ष का तो पता नहीं, पर जीने का खुद से तज़ुर्बा होता,
परिंदो के जीवन से जुडी, बस इतनी ही है कहानी
कितनी प्यारी होती है, इनकी छोटी सी ज़िंदगानी...
कवि- सुधीर पांडेय